भगवान श्री राम से हमें क्या सीख लेनी चाहिए ?
हरे
कृष्णा
आज हम भगवान श्री राम के करोड़ों-करोड़ों सद्गुणों में से 1 गुण पर चर्चा करेंगे जो गुण हैं उनके माता पिता के प्रति उनका सेवा भाव अनन्य भक्ति का भाव आदर भाव पलट कर जवाब ना देने का गुण उनकी आज्ञा का पालन करने का गुण अपना माता पिता के प्रति धर्म निभाने का गुण.
आज हम भगवान श्री राम के करोड़ों-करोड़ों सद्गुणों में से 1 गुण पर चर्चा करेंगे जो गुण हैं उनके माता पिता के प्रति उनका सेवा भाव अनन्य भक्ति का भाव आदर भाव पलट कर जवाब ना देने का गुण उनकी आज्ञा का पालन करने का गुण अपना माता पिता के प्रति धर्म निभाने का गुण.
भगवान श्रीराम को उनके पिता
श्री दशरथ महाराज ने कभी यह
नहीं कहा था कि तुम
बनवास जाओ परंतु माता कैकेयी ने भगवान श्रीराम
को यह बताया था
कि तुम्हारे पिता यह चाहते हैं
कि तुम बनवास जाओ इस बात को
सुनते ही भगवान श्री
रामने उसे अपने पिता की ओर से
आदेश मानते हुए अपने पिता की इच्छा मानते
हुए स्वीकार किया.भगवान श्रीराम का कोई अपराध
न होने के बावजूद उन्होंने
एक आदर्श पुत्र का उदाहरण दिया
है कि एक आदर्श
पुत्र को कैसा होना
चाहिए जो अपने माता
पिता की आज्ञा को
सर्वस्व मानकर शीघ्र अति शीघ्र उसका अमल करें चाहे उसके लिए हमें जहर ही क्यों ना
पीना पड़े शरीर ही को ना
त्याग देना पड़े.
भगवान श्री राम जो सर्व सामर्थ्यवान
हैं सर्वशक्तिमान है आकर्षक है
जिनकी एकमात्र पलक झपकने से संसार में
प्रलय आ सकता है
जिनकी इच्छा से यमराज भी
भयभीत हो जाते हैं
जिनकी इच्छा से सूर्य एवं
चंद्र प्रकट होते हैं वह यह बात
कहते हैं कि,
” मुझ में इतना सामर्थ्य नहीं है इतनी शक्ति
नहीं है इतना साहस
नहीं है कि मैं
माता-पिता की आज्ञा का
उल्लंघन कर सकूं” ऐसी माता पिता के भक्ति करने
वाला पुत्र इस पूरे भौतिक
संसार में कोई नहीं हो सकता.भगवान
श्री राम सुबह उठकर सर्वप्रथम अपने माता पिता को हाथ जोड़कर
सिर झुकाकर दंडवत प्रणाम किया करते थे.
हमें इस बात से
यह सीखना चाहिए कि यह शिक्षा
लेनी चाहिए कि हमें सदैव
हमारे माता-पिता का आदर करना
चाहिए उनको जो पसंद नहीं
हो वह कार्य नहीं
करना चाहिए उनकी हर आज्ञा का
पालन करना चाहिए हमें बातों-बातों में उन्हें नीचा नहीं दिखाना चाहिए और उन्हें डराना
नहीं चाहिए जैसा कि आज बहुत
सी संताने करते हैं.
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि मातृदेवो
भव: पितृ देवो भव: आचार्य देवो भव: अतिथि देवो भव: इसका अर्थ यह हुआ कि
सर्वप्रथम हमें हमारे माता पिता को सर्वस्वं मानना
चाहिए उनकी पूजा करनी चाहिए उनका आदर सत्कार करना चाहिए तत्पश्चात हमें हमारे शिक्षा देने वाले आचार्य के प्रति कृतज्ञ
होना चाहिए और अंत में
हमारे अतिथियों को देव मानकर
उनका स्वागत करना चाहिए सत्कार करना चाहिए.
1. जिस व्यक्ति को अपने माता-पिता में भगवान के दर्शन नहीं
होते उस व्यक्ति को
मंदिर मैं रखें भगवान के विग्रह में
भी भगवान के दर्शन नहीं
हो सकते.
2. हमारी सारी इंद्रियां अपूर्ण है और भगवान
पूर्ण पुरुषोत्तम है हमारा इस
संसार में रहकर हमारी अपूर्ण इंद्रियों से भगवान को
देखना असंभव है परंतु माता
पिता को सुबह शाम
दिन रात किसी भी समय देख
सकते हैं उनके साथ बातें कर सकते हैं
उनकी सेवा कर सकते हैं
और उनकी सेवा के द्वारा परोक्ष
रूप से हम भगवान
की सेवा कर सकते हैं
शास्त्रों
के अनुसार,
पुंनरीक नामक एक महान भक्त
हो चुके जो केवल अपने
माता-पिता की अनन्य भाव
से सेवा और वंदना किया
करते थे इतनी वंदना
किया करते थे की एक
बार स्वयं द्वारकाधीश द्वारका से उसके घर
आ पहुंचे उससे मिलने के लिए उसके
दरवाजे पर आकर भगवान
श्री द्वारकाधीश ने उसे आवाज़
दी और उसे कहा
कि वह उसे मिलने
आए हैं उसे शीघ्र आने के लिए कहा
उस समय पुंनरीक अपने माता-पिता की सेवा में
व्यस्त प्रतीत हो रहा था
इसलिए पुंनरीक ने भगवान द्वारकाधीश
से कहा कि कृपया थोड़ी
प्रतीक्षा कीजिए मैं अपने माता-पिता की सेवा कर
रहा हूं यह सुनकर भगवान
ने कहा करोड़ों लक्ष्मीया मेरी सेवा करने के लिए तत्पर
हैं और मैं तुमसे
मिलने आया हूं और तुम मुझे
प्रतीक्षा करने के लिए कह
रहे हो यह सुनकर
पुंनरीक ने बहुत ही
श्रेष्ठ उत्तर दीया.
पुंनरीक
ने कहा,
माता पिता की सेवा का
फल यह है कि
आप स्वयं साक्षात द्वारकाधीश मुझे मेरे घर पर मिलने
आए हो( जो अपने माता
पिता की सेवा करता
है उसे भगवान साक्षात दर्शन देते हैं ) और अगर आपको
जाना हो तो आप
जा सकते हो यह कहते
हुए पुंनरीक ने अपने पास
पड़ी एक ईट उठाकर
दरवाजे के पास फेंकते
हुए कहा थोड़ा समय राह देखिए इस सीट पर
बैठ जाइए मैं अपने माता पिता की सेवा करने
के पश्चात आपसे मिलने आता हूं.
राह देखते देखते द्वारकाधीश थक गए और
जैसे एक सामान्य व्यक्ति
तक थकने के बाद अपनी
कमर पर जैसे हाथ
रखता है वैसे ही
उन्होंने अपनी कमर पर हाथ रखा
और आज भी पंढरपुर
में भगवान उसी स्थिति में विराजमान है और आज
भी पुंनरीक ने फेंकी हुई
उस ईट पर खड़े
हैं.
राम जी जहर पीने
के लिए तैयार हैं अपने प्राण त्यागने के लिए तैयार
है किंतु अपने माता पिता को सामने जवाब
देने के लिए तैयार
नहीं है उन्होंने कभी
पलट कर माता पिता
को सामने जवाब नहीं दिया क्योंकि माता पिता का जो ह्रदय
होता है बहुत ही
कोमल होता है अगर उन्हें
कहा जाए तो उन्हें ऐसा
लगता है उनका अपमान
हुआ है इसलिए उनके
सामने कभी भी बोलना नहीं
चाहिए.जो कभी उनसे
भूल भी हो जाए
तो सर्वप्रथम उन्हें प्रणाम करके उनके साथ बैठकर शांति से उस बात
की आदर पूर्वक चर्चा करनी चाहिए.
इस संसार में
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो केवल अपने माता पिता का सम्मान तो
करते हैं किंतु उनकी आज्ञा का उल्लंघन भी
करते हैं.आज्ञा का अर्थ होता
है कि जैसा कहा
गया है वैसा ही
करना और जैसा वह
बताएंगे वैसा ही आप करेंगे
उसे कहते हैं आज्ञा और आज्ञा का
सम्मान करना ही माता पिता
की सेवा है.
हमें हमेशा हमारे हाथों तथा सिर को माता पिता
के चरणों में रखना चाहिए सिर जो है बुद्धि
का प्रतीक है और और
हाथ जो है क्रिया
का प्रतीक है इसका अर्थ
यह हुआ कि मैं अपनी
बुद्धि और क्रिया आपको
समर्पित या शरणागत करता
हूं और ऐसा ही
भगवान रामचंद्र नित्य किया करते थे यह दिव्य
गुण है भगवान रामचंद्जी
का जो आज के
समाज में हमें उनसे सीखना चाहिए.
आज हर व्यक्ति
बीटेक, एमटेक, MBA, CA, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, लेखक, कवि, डांसर, कलाकार, बनना चाहता है और बन
भी जाता है और उससे
व्यक्ति में अहंकार की भावना आ
जाती है उसके बाद
वह अपने माता पिता की सेवा में
से धीरे धीरे दूर होता जाता है.
रामचरित मानस में तो यहां तक
कहा गया है कि इससे
अच्छा तो व्यक्ति का
मूर्ख रहना ही ज्यादा अच्छा
है ऐसी विद्या कोई काम की नहीं है
जो आपको आपके माता-पिता से उनकी सेवा
से दूर ले जा रही
हो इससे अच्छा तो अशिक्षित रहना
ही ज्यादा अकलमंदी है
हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे



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