दुःख एवं कष्ट का मूल कारण क्या है ? What is the root cause of sorrow and suffering?
दुनिया में हर मनुष्य हर समय हर पल अपनी किसी न किसी प्रवृति के कारण या अपने आसपास के परिबलो के प्रभाव के कारण अपने आप को ऐसी दुविधा में पाता है जहा उसे लगता है की वह कष्ट में है परन्तु वह इस कष्ट का मूल कारण नहीं जानता इसलिए वह उस कष्ट से जूझता है और उससे लड़ने का प्रयास करता है परन्तु मित्रो हम यहाँ उस कष्ट का मूल कारण समझ ने का प्रयास करेंगे. हर कष्ट एवं दुःख का मूल हे (मिथ्या ज्ञान) मिथ्या ज्ञान के कारण हमारी इन्द्रियों में दोष उत्पन होता है दोष का अर्थ ये हुआ की हम अपने आपको ही सभी वस्तुओ का कर्त्ता समज बैठते है और इस दोष पूर्ण अवस्था में हमारे द्वारा किसी विषय वास्तु को प्राप्त करने के लिए या किसी विषय वस्तु का त्याग करने के लिए की गई प्रवृति भी दोषयुक्त बन जाती है इस प्रवृति को लौकिक भाषा में कर्म कहते है और जब हमारा एक भी दोष युक्त कर्म शेष रह जाता है तो हमें उस दोष युक्त कर्म से छूटने के लिए इस संसार में फिर से जन्म लेना पड़ता है और हमारे वेद पुराणों में बता...